Thursday, July 23, 2015

मनहरण धनाश्ररी


माटी मिलनी जो देह , उससे क्यो? करे नेह,
बात आज ज्ञान की तू , खुद मे उतार ले।

क्रोध पे तू डाल जल, होंसलों को दे अनल,
मन को गगन कर , जीवन संवार ले।

धरा का तू ध्यान कर , बन जा तू चक्र धर,
चक्रव्यूह रचने को , गीता से तू सार ले।

साँसो मे तूफान भर , रण का आगाज कर,
शत्रु का विनाश कर , जीवन को तार ले॥

बादल 

मधुशाला छन्द

पाप पुण्य मे भेद न कर तू , नेक काम सब करता जा।
मात पिता की सेवा कर के , कर्म टोकरी भरता जा॥
सतकर्मो का फल पाये हो, जो इंसा बन आए हो ,
श्रवण कुमार बनाके खुदकों , इनके दुख सब हरता जा॥

बादल

कुंडलिनी

काले बदरा देखके, नैन बहाए नीर।
बैरी साजन दूर है, किसे सुनाए पीर
किसे सुनाए पीर, देह ये अग्न लगाए।

झर झर झरते मेघ, मिलन की प्यास बढ़ाए ॥  

बादल

Monday, July 6, 2015

सपनों मे मेरे जो दिलबर बसता है
नजरों से अपनी वो छलता रहता है
पूरे हो जाएंगे ख्वाब सभी अपने
खामोशी से वो ये मुझको कहता है

बादल